मर्यादा, विज्ञान और पुरातन ज्ञान का समन्वय बने विकास का आधार

19 जून 2016, 7:19 am द्वारा news reporter प्रेषित   [ 19 जून 2016, 7:24 am अपडेट किया गया ]
प्रकृति की मर्यादा, विज्ञान और पुरातन ज्ञान का समन्वय बनाकर चलना केदारनाथ यात्रियों की हुतात्माओं को सच्ची श्रद्धांजलि होगी : डॉ. मोहन भागवत जी
Uttarakhand
17 जून,नई दिल्ली (इंविसंके)। उत्तराखंड के केदारनाथ में 2013 में आई प्राकृतिक आपदा की तीसरी बरसी पर मावलंकर सभागार में हुतात्माओं को श्रद्धांजलि अर्पित की गई. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि जिन कारणों से इतने सारे श्रद्धालु उस आपदा में मारे गए उन कारणों पर विचार कर उनसे सीख लेने की आवश्यकता है. उन्होंने बताया कि सदियों से हिमालय की गोद में हमारा समाज फलता-फूलता रहा है. पहले भी वहां प्राकृतिक आपदाएं आती रही हैं, परन्तु मन को उद्वेलित करने लायक कोई प्रसंग किसी प्राकृतिक आपदा में इससे पूर्व नहीं मिलता है।

ऐसी भौगोलिक स्थिति होने पर भी इतने वर्षों तक वहां लगातार समाज का जीवन चलता रहा, ऐसी कौन सी विधा हमने अपनाई जिसके कारण ऐसा हम कर सके। हिमालय का भूगोल तो पहले से वही है, नया पर्वत है, बढ़ रहा है, इसलिए वहां मिट्टी खिसकती है। एक टकराहट से हिमालय उत्पन्न हुआ है इसलिए प्लेट टैक्टोनिक की सब तरह की सम्भावनाएं भी वहां हैं। यह सारी बातें पहले से हैं और पहले से कुछ न कुछ तो ऐसा होता ही होगा। लगातार ऐसी बातें होती होने के बाद भी वहां पर मनुष्यों की बस्ती रही, फलीं-फूलीं और वो हमारी यात्रा का स्थान बन गया। हमारी तपस्याओं का स्थान बन गया, हमारी देव भूमि बन गया। तो हमारे पूर्वजों ने यह सारी बातें कैसे साधी. इसके लिए हमारे प्राचीन ग्रंध, पुराण और लोक श्रुति- जन श्रुतियों, परम्पराओं में प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहना बताया गया है, जिसका पालन हम सदियों से करते रहे थे. हमको यह ध्यान रखना चाहिए कि जहां जो विकास करना है उसके लिए वहां के जनमानस में परम्पराएं क्या हैं, जन श्रुतियां क्या हैं, उसका महत्व क्या है, विकास नीति में इसका भी हिसाब होना चाहिए। परीक्षा पर खरी उतरने वाली अपनी पारंपरिक बातों को विकास नीति में शामिल करना कुछ गलत नहीं है।

Uttarakhand002
सरसंघचालक जी ने कहा कि विकास की हमारी परम्परागत दृष्टि सम्पूर्ण सृष्टि के चैतन्य को मानती है। इसलिए हम सृष्टी के कण-कण को आपस में सम्बन्धित मानते हैं। इसलिए नदियों की स्वच्छता हमारे यहां कभी सरकारी नीति का विषय नहीं रहा, बल्कि स्थानीय स्तर पर यहाँ समाज तथा व्यक्तियों ने स्वयं अपने लिए नदियों को स्वच्छ रखने के नियम तय कर रखे थे। हमारी जो विकास की अवधारणा की दृष्टि है वह परस्पर सम्बन्धों का विचार करती है इसलिए उसमें हर बात की मर्यादा है। मनुष्य का विकास होना चाहिए लेकिन हमें अमर्यादित नहीं होना है। प्रकृति के प्रति हमने अपनी मर्यादा को लांघा तो मनुष्य के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होता है, यह वैश्विक सच है. क्षमता है इसलिए निर्माण करना यह निर्माण करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं है। क्षमता को विवेक की मर्यादा भी होनी चाहिए। विकास, पर्यावरण, विज्ञान और नीति के सारे झगड़े की जड़ ही इसमें है कि सबको मर्यादा में चलना है। विज्ञान की भी मर्यादा है, अध्यात्म की भी मर्यादा है। दोनों धर्म के पूरक होने चाहिए। यह मर्यादा का विवेक नीतियों के साथ ही हमारे-आपके आचरण में भी होना चाहिए। उचित नीतियों के द्वारा, आने वाले संकटों की कल्पना करते हुए आने वाले संकटों को प्रतिबन्धित कर सकें, ऐसी व्यवस्थाएं बिल्कुल ठीक बात है। परन्तु किसी भी संकट का सामना करना है तो मनुष्य की जीवट और मनुष्यों का मनुष्यों के प्रति कर्तव्य बोध जो आत्मीयता से उत्पन्न होता है, उसे पैदा करना आवश्यक है.

समाज को स्वार्थ प्रवृत करने वाला काम कभी नहीं होना चाहिए। मनुष्य को सेवा परायण, परोपकार प्रवण बनाने वाली, संस्कार देने वाली सब नीतियां होनी चाहिए। उत्तराखण्ड की त्रासदी का स्मरण करने के बाद अपने सामने जो बातें खड़ी होती हैं, उन सबका निदान इन बातों में है। मर्यादाओं को जानकर इन नीतियों का निर्माण होना चाहिए। परम्परा से आए हुए ज्ञान की समीक्षा, विश्लेषण करके, उसमें जो सिद्ध है उसको स्वीकार करना चाहिए। आधुनिक ज्ञान और पुराने ज्ञान की परीक्षा के बाद स्वीकृति और अस्वीकृति होनी चाहिए। मर्यादा का आचरण सब जगह होना चाहिए। मुख्य बात है कि अगर हम सब लोग एक दूसरे के सुख दुख की संवेदना के साथ तन्मय हैं तो ऐसा कोई संकट नहीं है जो प्रकृतिक हो या मानव निर्मित हो, ऐसा कोई संकट नहीं है जो हम लोगों को नामो हरम कर सकता है, हम लोगों को समाप्त कर सकता है। मुम्बई में विस्फोट का समय, लोग तुरन्त वहां से भागे नहीं लोग सहायता करने स्थल पर पहुंच गए और अस्पतालों में खून देने के लिए पहुंच गए। हम को विचार करना चाहिए कि हमारे समाज का यह स्वभाव कैसे बना। क्यों यहां लोग अपने परिवार के सदस्यों की हानि को न देखते हुए उनकी सुरक्षितता निष्चित कर तुरन्त बाकी लोगों के इलाज में सुरक्षा में लग जाते हैं। संघ के तो संस्कार हैं ही, लेकिन संघ के यह संस्कार भारत में नए नहीं हैं. संघ केवल अपनी परंपरा में आत्मीयता और संबंधों का जो संस्कार है जो हमको विरासत में मिला है उसको आदमी के हृदय में और बड़ा करने के सिवाय और कुछ नहीं करता। हम सब लोग इसको जानें और इसको करने में लग जाएं तो हमको ऐसे कारणों से बार-बार श्रद्धान्जलि सभा का आयोजन नहीं करना पड़ेगा।

हम मर्यादा, विज्ञान और पुरातन ज्ञान इनके साथ समन्वय साध कर चलें. मनुष्यों के सम्बन्धों का ध्यान रखकर अपना आचरण स्वार्थ परख न करते हुए उसको सेवा परायण बनाएं। हमारे उपनिषदों में जो आदेश है कि त्यागपूर्वक जियो, उसका अपने जीवन मे आचरण करो. हम सब सामान्य लोगों के लिए उस सबक को सीखना, उसके अनुसार चलना उस त्रासदी में हमसे विदा हुए हमारे समाज के आत्मजनों को सच्ची श्रद्धान्जलि होगी। उसका संकल्प मन में लेकर आप सब लोग यहां से जाएं। 

श्री मुरली मनोहर जोशी ने चिंता प्रकट कर कहा कि जिन कारणों से उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आई उन कारणों को ठीक करने में  कितना समय और लगेगा. भारत अगर हमारी माता है तो हिमालय हमारा पिता है, जो उत्तरी ध्रुव से आने वाली बर्फीली हवाओं से हमें बचाता है. हिमालय बचने की ओर नहीं अपितु नष्ट होने की ओर बढ़ रहा है. इसको बचाने के लिए आधुनिक परिप्रेक्ष में क्या किया जाए इस पर विचार कर कदम उठाने की आवश्यकता है. हिमालय का प्रबंधन मैदानी क्षेत्रों की तरह नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी अपनी विशेष परिस्थितिकी है. भारी मशीनों, बड़ी-बड़ी सड़कों का बोझ हिमालय नहीं सह सकता. तीर्थ यात्रा के लिए अस्थाई निर्माण तथा सीमा की सुरक्षा के लिए आवश्यक सड़कें ही बनानी चाहिए. चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर बड़े-बड़े बांध बनाने तथा उसके जल प्रवाह को बदलने के प्रयास को उन्होंने कहा कि यह विश्व के लिए संकट बन सकता है.

केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि उत्तराखंड समर वेकेशन के लिए हिल स्टेशन नहीं है बल्कि एक धार्मिक स्थान है, यह ध्यान में रखकर वहां नीति व नियम बनाए जाएं.

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व हरिद्वार से संसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने बताया कि केदारनाथ की त्रासदी सदी की सबसे बड़ी त्रासदी थी, अभी तक वहां लापता हुए सभी तीर्थयात्रियों का पता नहीं चला है. ऐसी त्रासदी दुबारा न आए इसके लिए उन्होंने हिमालय के लिए अलग से मंत्रालय बनाने के मांग की.

केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री श्री प्रकाश जावडेकर ने कहा कि 150 करोड़ रुपये की सहायता से हिमालय पर स्टडी होगी. हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र को समझकर रोजगार और पर्यटन को देखते हुए नीति बनेगी. इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर सख्ती से नियमों का पालन करवाना होगा. हिमालय को बचाने के लिए हम सभी को अपने ‘ग्रीड’ के बजाए ‘नीड’ पर चलना होगा.

पूर्व थल सेनाध्यक्ष तथा केंद्रीय मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने कहा यह श्रद्धांजलि दिवस हम सबके लिए स्वयंसेवकों से सीख लेने का दिन है कि ऐसे समय में क्या करना चाहिए, कैसे सहयोग किया जाए.

 

दंडी स्वामी श्री जीतेन्द्र स्वामी ने बताया कि मनुष्य प्रकृति से ऊपर नहीं है. हमें पर्यटन और तीर्थांटन में अंतर करना होगा. तीर्थांटन को पर्यटन के रूप में देखने का नतीजा दैवीय आपदा के रूप में केदारनाथ, पशुपतिनाथ और महाकालेश्वर में देखने को मिला.

इस आपदा के भुक्तभोगी बिहार से सांसद श्री अश्वनी चौबे जो परिवार सहित केदारनाथ में मौत के मुँह से बचकर आए उन्होंने बताया कि ऐसी प्राकृतिक आपदा में क्या होना चाहिए, इस पर विचार होना चाहिए. सरकार की ओर से वहां कोइ व्यवस्था नहीं थी. लाखों श्रद्धालुओं की ईश्वर में श्रद्धा तब टूट जाती है जब ऐसे समय में कोइ देखनहारा नहीं होता. बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने विद्या भारती के विद्याययों में शरण दे कर उनके जैसे सैकड़ों तीर्थयात्रियों को बचाया.

कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व केन्द्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने की। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह कृष्ण गोपाल, विदेश राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह, वन एव पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक श्री अनिल कुमार गुप्ता, कर्नल अशोक गिन्नी आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का आयोजन केदारनाथ त्रासदी में अपने परिवार के आठ सदस्य गंवाने वाले और स्वयं काल के मुख से सुरक्षित बाहर आने वाले भाजपा सांसद एवं बिहार सरकार में पूर्व मंत्री अश्विनी चौबे के अखिल भारतीय उत्तराखंड त्रासदी मंच द्वारा किया गया। इस अवसर पर श्री चौबे की उत्तराखंड की त्रासदी पर लिखी पुस्तक ‘त्रेहन’ का विमोचन भी किया गया. कार्यक्रम के आरम्भ में एक वृत्तचित्र के माध्यम से प्राकृतिक आपदा से ग्रस्त उत्तराखंड सुदूरवर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवा कार्यों को प्रदर्शित किया गया.


Comments