स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन,कुछ रोचक बातें

12 जन॰ 2016, 5:37 am द्वारा news reporter प्रेषित   [ 12 जन॰ 2016, 5:44 am अपडेट किया गया ]
swami-vivekananda
भारतवर्ष के पावन धरती पर बहुत से महापुरुषों ने जन्म लिया है। उन्हीमे से एक महापुरुष है स्वामी विवेकानन्द। महाज्ञानी और विद्वान कहे जाने वाले स्वामी विवेकानन्द का जन्म आज ही के दिन 12 जनवरी सन् 1863 को कोलकाता में हुआ था। आपको बात दें की स्वामी विवेकानन्द का बचपन से नाम यह नहीं था बल्कि उन्हें बचपन में नरेन्द्रनाथ दत्त नाम से जाना जाता था। नरेन्द्रनाथ बचपन में बहुत ही नटखट स्वाभाव के थे। आपको बता दें की उनके घर पर ए दिन पूजा-पाठ किया जाता था। घर में बचपन से ही धार्मिक वातावरण होने के कारण उनकी रूचि भगवान को जानने में थी। नरेन्द्र में भगवान को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। आपको बता दें की बढ़ती उम्र के साथ साथ यह लालसा भी बढ़ती गयी।

जानकारी के लिए आपको बता दें की स्वामी विवेकानन्द के पिता विश्वनाथ दत्त एक जाने-माने कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। उनके पिता हमेशा से यह चाहते थे की उनका बेटा अँग्रेजी पढ़ाकर अंग्रेज़ो की तरह रखना चाहते थे। मगर वही उनकी मां जो पूजा-पाठ में ज्यादा वक़्त गुज़ारा करती थी उन्हें यह राय पसंद ना थी। मगर घरवालो को क्या पता था की स्वामी विवेकानन्द का मन भगवान को जानने में लगा हुआ रहता था।

कहा जाता है कि स्वामी विवेकानन्द वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। आपको बाता दें की उनकी बुद्धि बचपन से ही तेज़ थी। बड़े होकर अपने मन के सवालों को खोजने के लिए स्वामी विवेकानन्द सबसे पहले ब्रह्म समाज में गए परन्तु वहाँ उनके चित्त को सन्तोष नहीं हुआ। वह हमेशा से ही योग को पश्चिम संस्कृति में प्रचलित करने के लिये महत्वपूर्ण योगदान देना चाहते थे। मगर उसी बीच जैसे उनपर दुखो का पहाड़ टूट गया। उनके पिता का देहांत हो गया जिसके बाद उनके ऊपर घर की सारी ज़िम्मेदारियां आ गयी थी। एक वक़्त ऐसा भी आया था जब स्वामी विवेकानन्द के घर की हालत बहुत ही ख़राब हो गयी थी।

1893 साल में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म सम्मेलन हो रही थी। स्वामी विवेकानन्द उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे। इउरोप-अमरीका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। परन्तु एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला। उस परिषद् में उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। फिर तो अमरीका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ। वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया। तीन वर्ष वे अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया।
आभार : इन्डिया.कम
Comments